कर्म - अच्छा या बुरा?
…..विजय रुस्तगी
बचपन से सुनते आ रहे हैं- यदि एक व्यक्ति अच्छा कर्म करता है तो उसे उसका फल अच्छा मिलता है और बुरे कर्म का नतीजा बुरा ही होता है। भले ही यह फल इस जन्म में मिले या अगले जन्म में, पर मिलता अवश्य है।
कितनी अच्छी सोच है। समाज में अच्छाई को बढ़ावा देने के लिए वाकई यह रामबाण है।
यह विषय काफी वृहद है इसलिए आज सिर्फ इस विषय पर विचार करेंगे कि एक कर्म कब अच्छा होता है और कब बुरा। हमारी बातचीत अधिकांशतः सामाजिक विश्वास और श्रद्धा पर आधारित है, ना कि किसी कानून के आधार पर।
आज के अध्ययन में दो शब्दों का प्रयोग कई बार होगा - कार्य और कर्म । कार्य वे जो हमें दिखाई पड़ता है जबकि कर्म का अर्थ कार्य से भी बृहद है क्योंकि इसमें कार्य के अलावा और भी कई बातों का समावेश है ।
क्या सारे कर्म जैसे दिखते हैं वैसे ही होते हैं? कोई भी कार्य पहले मस्तिष्क में विचार के रूप में आता है और अधिकांशतः सोच समझ के किया जाता है । बहुत से कार्य क्रोध में, वात्सल्य में या घृणा स्वरूप भी किए जाते हैं । तो क्या हमारी सोच और विचार भी उस कर्म के हिस्से होते हैं ? क्या कार्य के पीछे छुपे भाव भी उस कर्म का हिस्सा होते हैं? हां बिल्कुल, पौराणिक हिंदू शास्त्रों के आधार पर विचार और भाव भी कर्म होते हैं, ऐसा बौद्ध धर्म में भी कहा गया है।
कोई भी कार्य ज्यादातर बहुत सारे विकल्पों में से एक विकल्प होता है। यदि ज्यादा विकल्प नहीं है तो भी वह कार्य करना या ना करना, में से एक को चुना जाता है । अर्थात यह निर्णय लेना कि कार्य ना करें -भी एक कार्य है।
इस तरह कर्म में बहुत सी बातें शामिल हो गई - कार्य, विचार, भाव, विकल्प, और परिस्थितियां।
एक कर्म अच्छा है या बुरा - कुछ उदाहरणों के सहारे समझने की कोशिश करते हैं।
विचार और उस पर आधारित कार्य का विश्लेषण यह बताता है कि वह कर्म अच्छा है या बुरा । क्या ऐसा हो सकता है कि कोई कार्य हमेशा बुरा हो, शायद इसका उत्तर “नहीं” है। उदाहरण के तौर पर- यदि जहर की पुड़िया किसी को इस विचार से दी जाती है कि वह उसकी मृत्यु का कारण बने ,तो निश्चित ही यह कर्म बुरा है। यदि यह पुड़िया एक दवाई के रूप में डॉक्टर द्वारा दी जाती है इस विचार से कि रोगी अच्छा हो जाएगा, तो निश्चित ही इस कर्म से अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता।
एक और उदाहरण इसी प्रकार से दिया जा सकता है कि किसी को अपंग करने के लिए उसका हाथ काटना एक बुरा कर्म है और एक सर्जन द्वारा कैंसर जैसी बीमारी को फैलने से रोकने के लिए हाथ काटना ताकि उस व्यक्ति की जान बच सके, किसी भी हालत में एक बुरा कर्म नहीं कहा जा सकता।
एक व्यक्ति घने जंगल में जा रहा है और उसके पास आत्मरक्षा के लिए बंदूक भी है । रात के अंधेरे में अचानक एक शेर उस पर हमला कर देता है। वह व्यक्ति आत्मरक्षा के लिए बंदूक चलाता है और शेर मर जाता है। क्या इसे बुरे कर्म की श्रेणी में रखा जा सकता है, शायद नहीं । इसी दृष्टांत में, यदि वह व्यक्ति जंगल में शेर के शिकार का विचार लेकर घुसा है और उसकी खाल को अपने ड्राइंग रूम में सजाने का इरादा रखता है। ऐसी सोच और इरादे के साथ यह कर्म निश्चित ही बुरा है।
इसी प्रकार से यदि किसी को ऐसा लगता है उसका दोस्त उसकी गलती छुपा रहा है उसे बचाने के लिए, तो निश्चित ही एक अच्छा कर्म है ,पर यदि वह दोस्त इसलिए छुपा रहा है ताकि वह बिगड़ जाए और आने वाली जिंदगी में प्रगति ना कर सके ,तो ऐसे विचार के साथ यह कर्म अच्छा नहीं कहा जा सकता।
दान देना या आवश्यकता पड़ने पर किसी की सहायता करना बहुत अच्छी बात है ।मगर उसके पीछे विचार घमंड भरे हों और दूसरे को हेय दृष्टि से देखते हुए किए गए हों, तो इस कर्म में जरूर ही कोई बड़ी कमी रह गई है।
बहुत सारे विकल्पों में से एक का चुनाव उस क्षण या समय में उपस्थित परिस्थितियों पर आधारित होता है ।कार्य करने के बाद यह कहना पडे़ कि यह अच्छा था या बुरा, तो हमें उस कार्य के समय की परिस्थितियों का अध्ययन करना पड़ेगा ।
यह जानने के लिए कि एक कर्म अच्छा है या बुरा, बहुत सारी चीजों का अध्ययन करना पड़ेगा - जैसे कि उसे करने से पहले का विचार, मन में उत्पन्न भाव, बहुत से विकल्पों में से एक का चुनाव, उस समय की परिस्थितियां .आदि । परंतु हम लोग सिर्फ कार्य को देखते हैं और अपनी धारणा बना लेते हैं कि वह कार्य अच्छा है या बुरा। जाहिर है कि ऐसी धारणाएं और बोली हुई बातें कई बार गलत साबित होती हैं।
निश्चित तौर पर, यह उस व्यक्ति को ही पता है जो कर्म कर रहा है कि उसके विचार क्या हैं,उसकी परिस्थितियां क्या हैं? , इसलिए वही व्यक्ति ईमानदारी से सभी तथ्यों का अध्ययन कर निर्णय ले सकता है कि उसका किया गया कर्म अच्छा है या बुरा।
निष्कर्षतः कोई भी कर्म अच्छा या बुरा, तात्कालिक कार्य, विचार, भाव और परिस्थितियों पर आधारित होता है ।
अति उत्तम
ReplyDeleteआपका आकलन और प्रस्तुति एकदम सही और व्यवहारिक है। कर्म और विवेक का सामंजस्य सदकर्म का आधार बनता है। आभार
ReplyDeleteबहुत अच्छा विचार
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