-- विजय रुस्तगी
सफलता की परिभाषा
बहुत सीधे सरल शब्दों में यदि हम कोई लक्ष्य निर्धारित करें और उसे निश्चित समय सीमा में प्राप्त कर लें, उसे ही सफलता कहते हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि हम जो भी लक्ष्य निर्धारित करते हैं, उसे प्राप्त करने की एक समय सीमा होती है, और उस समय सीमा के अंदर लक्ष्य को प्राप्त करना ही सफलता है। जैसे मैं 2021 में आईएएस की परीक्षा पास करूँगा ।
जिंदगी में छोटे-बड़े कई लक्ष्य हो सकते हैं| कुछ लक्ष्य बहुत ही छोटे समय के लिए होते हैं और कुछ जीवन पर्यंत के लक्ष्य होते हैं। कई बार एक मुख्य लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बहुत सारे छोटे छोटे लक्ष्य बनाने पड़ते हैं।
ऐसे छोटे-छोटे और बड़े बड़े कई लक्ष्यों को हम समय-समय पर निर्धारित करते हैं और ऐसी कई छोटी बड़ी सफलताएँ हमें प्राप्त होती हैं।
लक्ष्य निर्धारण
अब प्रश्न यह उठता है कि कैसे निर्धारित किया जाए लक्ष्य को। लक्ष्य निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित तत्वों को समझने की आवश्यकता है।
1. इच्छा:
वह दिन, जब कोई व्यक्ति पैदा होता है, उसकी इच्छाएँ होती हैं। प्रारंभ में भूख को संतुष्ट करने के लिए, और बाद में आराम, धन, शराब, सामाजिक स्थिति के लिए। मनोकामना की पूर्ति से सुख की प्राप्ति होती है।
इच्छा रूपी घोड़े ही हैं जिससे पूरी मानव जाति चलती है। यह एक ईश्वर प्रदत्त विशेषता है, जिसने जंगलों में रहने वाले आदि-मानव को शहरी आरामदायक जीवन शैली वाली वर्तमान स्थिति तक पहुँचाया है।
प्रत्येक इच्छा की पूर्ति की लालसा को हम एक संगठित तरीके से सोचते हैं, तो कुछ चुनिंदा इच्छाएं लक्ष्य में परिवर्तित हो सकती हैं। एक अल्पकालिक, मध्यम अवधि या दीर्घकालिक लक्ष्य हो सकता है। पर क्या केवल इच्छा ही लक्ष्य को निर्धारित कर सकती है? सभी इच्छाएं लक्ष्य नहीं बनती। हां कुछ इच्छाएं सोच समझ के बाद कालांतर में लक्ष्य में परिवर्तित हो जाती हैं।
2. कार्य कौशल और योग्यता :
लक्ष्य प्राप्त करने के लिए बहुत ही मेहनत, लगन और योग्यता की जरूरत होती है । यदि कोई आवश्यक योग्यता नहीं है तो उसे पाने के लिए क्या करना है? कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए क्या कोई प्रशिक्षण की आवश्यकता है? जैसे बैंक में अधिकारी की नौकरी प्राप्त करने के लिए स्नातक होना आवश्यक है। यदि हम इन सब बातों का ध्यान रखते हैं और उसके बाद लक्ष्य को निर्धारित करते हैं तो उस लक्ष्य को प्राप्त करने की संभावना बढ़ जाती है ।
3. आवश्यक संसाधन
जब हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए एक लक्ष्य निर्धारण की योजना बनाते हैं, तब यह जानना आवश्यक हैं कि क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं? क्या साधन हैं? लक्ष्य प्राप्ति के लिए संसाधनों की भी आवश्यकता होती है जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करना और उसके लिए आवश्यक फ़ीस जमा कराना । यदि आवश्यक सुविधाएँ एवं संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, तो इन्हें कैसे जुटाया जा सकता है? किसी सुविधा या संसाधन में कमी होने पर उसके बिना या उसके कम होने पर कैसे कार्य पूरा किया जाए, पूरी योजना बनाना आवश्यक है।
4. लक्ष्य के प्रति उत्साह
यह जानना भी जरूरी है कि हम लक्ष्य के प्रति कितने उत्साहित हैं? यदि लक्ष्य हमने स्वयं निश्चित किया है तो उसके प्रति हमारा उत्साह ज्यादा रहेगा। कभी-कभी यह लक्ष्य किसी और द्वारा निर्धारित होता है ऐसी हालत में उत्साह में कमी आने की संभावना रहती है।
यदि हमें अपना लक्ष्य आसान सा प्रतीत होता है तो बहुत संभव है कि उस पर इतनी मेहनत ना करें जितनी हम कर सकते हैं। परिणाम स्वरूप हम लक्ष्य से पीछे रह जाते हैं। यदि हमें लक्ष्य बहुत कठिन प्रतीत होता है तो हम निराश हो जाते हैं और बहुत संभावना होती है कि हम उस लक्ष्य तक न पहुंच सकें। तो क्या करें?, क्या लक्ष्य आसान रखें? या लक्ष्य बहुत कठिन रखें? दोनों ही अवस्था में ऐसा लगता है कि उत्साह में कमी रहेगी और लक्ष्य तक पहुँचना मुश्किल हो जाएगा। यदि स्वयं ही लक्ष्य निर्धारित करना है तो लक्ष्य को ना बहुत कठिन ना बहुत सरल रखें, बल्कि ऐसा जिस तक कड़ी मेहनत लगन के बाद पहुंच सके जिससे मन में यह विश्वास हो कि हमें लक्ष्य मेहनत करने से प्राप्त हो जाएगा । ऐसा लक्ष्य निर्धारण सफलता की ओर अग्रसर करता है।
हमारा आकलन कि हम लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे या नहीं ,बहुत महत्वपूर्ण है. यदि लक्ष्य तक पहुंच पाने की संभावना है तो हम उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उत्साहित रहते हैं और उसके लिए प्रयत्न करते हैं। यदि यह मान लें यह लक्ष्य तो हमें प्राप्त होगा ही नहीं या यह बहुत दूर है या हम इसके काबिल ही नहीं हैं तो बहुत अधिक संभावना है कि हम हतोत्साहित हो जाएं और हम उस हिसाब से मेहनत ही न करें। अंततः हम लक्ष्य तक न पहुंच पाए।
5. अपेक्षित समय
हर लक्ष्य को निर्धारित करते हुए उसे एक समय सीमा में बांधना पड़ता है। यदि हम एक लक्ष्य बनाएँ और उसकी कोई समय सीमा ना रखें तो वह लक्ष्य ही नहीं कहलायेगा क्योंकि यदि समय सीमा ना हो तो उसके लिए जो प्रयास चाहिए वह प्रयास नहीं होंगे। अतः लक्ष्य के लिए एक अपेक्षित समय सीमा होना आवश्यक है।
बहुत आवश्यक है कि हम उपरोक्त बातों का ध्यान रखकर सही ढंग से अपने लक्ष्य का निर्धारण करें ताकि हमें सफलता प्राप्त करने में आसानी हो।
लक्ष्य के प्रकार
लक्ष्य के कई प्रकार होते हैं-
अल्पकालिक लक्ष्य: ऐसे लक्ष्य जिन्हें आज ही या एक हफ्ते 1 महीने में प्राप्त किया जा सकता है जैसे आज मुझे रसायन शास्त्र का अध्याय 5 पूरा करना है ।
मध्यकालिक लक्ष्य: ऐसे लक्ष्य जिन्हें 3 महीने से 1 वर्ष में प्राप्त किया जा सकता है जैसे मुझे विवाह की तैयारी 3 महीने में करनी है। मुझे एक वर्ष में नया प्रोडक्ट बाजार में लाना है।
दीर्घकालिक लक्ष्य: ऐसे लक्ष्य जिन्हें 3 वर्ष से 5 वर्ष या उम्र भर में प्राप्त किया जा सकता है जिंदगी में सपने जैसे लक्ष्य , जैसे मुझे देश का प्रधानमंत्री बनना है।

कई बार हम एक ही वक्त पर बहुत सारे लक्ष्यों के पीछे भागते हैं। कुछ छोटे-छोटे होते हैं और कुछ बड़े-बड़े। हम हर लक्ष्य , चाहे वह छोटे हो या बड़े, को पाना चाहते हैं।
हमें अपनी जिंदगी में एक या दो दीर्घकालिक बड़े लक्ष्य रखने चाहिए। ऐसे लक्ष्य जो जीवन भर का सपना हो। ऐसे लक्ष्यों के लिए समय अधिक चाहिए, इसलिए हम ऐसे लक्ष्य भी निर्धारित कर सकते हैं जो हमारी हिम्मत, हमारी सामर्थ्य से ज्यादा हो ताकि हम अपनी पूरी मेहनत, पूरी लगन, पूरी सामर्थ्य उस तरफ लगा सकें और हम सामान्य तरीके से जो पा सकते हैं उस से ज्यादा प्राप्त कर सकें।
क्रमशः---------
आगे पढ़िए मेरे अगले ब्लॉग में
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