एक दृष्टांत - महाभारत से
……….. विजय रुस्तगी
सत्य की महत्ता सभी को विदित है। पुराने ग्रंथों में और बचपन से ही प्राप्त शिक्षा के अनुसार सत्य अकाट्य है और किसी भी परिस्थिति में इससे विमुख नहीं हुआ जा सकता।
पर क्या इसके भी कुछ अपवाद है? क्या यह सत्य नहीं, कि सामाजिक तौर-तरीकों में काफी प्रयोग होते रहते हैं और कोई एक तरीका हमेशा कारगर साबित नहीं होता। ऐसी कौन सी परिस्थितियां हैं, जहां सच ना बोलना ही उचित है।
सत्य या असत्य को तर्क और बुद्धि से दूसरे व्यक्ति को समझाया जा सकता है। और जब वह दूसरा व्यक्ति क्रोध में हो , तब क्या वह सत्य असत्य को समझ पाएगा। यदि वह क्रोधित व्यक्ति जान लेने पर उतारू हो, तब क्या करें ? अपनी जान बचाने के लिए या किसी और की जान बचाने के लिए सत्य असत्य की परवाह किए बिना, चतुराई से काम ले कर वही बोलना चाहिए जो उस परिस्थिति के लिए ठीक हो।
एक ऐसा ही दृष्टांत है द्वापर युग का। इस युग में महाभारत का युद्ध हुआ था और पाप - पुण्य ,सत्य -असत्य की परिभाषाएं दी गई थीं ।
तत्कालीन राजा कंस की बहन देवकी का विवाह वासुदेव के साथ हुआ और हंसी - खुशी पूरे सम्मान के साथ कंस उन्हें अपने रथ में बैठा कर राजधानी की ओर ले जा रहा था। तभी अचानक बादल घिर आए, बिजली कड़की और आकाशवाणी हुई - हे कंस ! जिसे तुम अपने रथ में बिठा कर ले जा रहे हो उस की आठवीं संतान तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगी ।
फिर क्या था देखते ही देखते पूरा माहौल बदल गया । कंस की आंखें क्रोध से लाल हो गई, उसने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाली और अपनी ही बहन, देवकी का वध करने को उतारू हो गया । वासुदेव के तो होश ही उड़ गए। कुछ समझ में नहीं आ रहा था फिर भी उन्होंने अपने आप को संयमित रखा और बुद्धि से काम लिया ।
वासुदेव दिखने में शांत पर उसके मन में विचारों का अंधड़ - जरा सी चूक और नववधू देवकी का वध । इससे भी अधिक और क्या बुरा हो सकता है ।
वासुदेव ने हाथ जोड़कर विनय पूर्वक सधे शब्दों में कहा- हे कंस ! मृत्यु का कारण तो आठवीं संतान है, देवकी नहीं । हम दोनों स्वयं अपने हाथों से आठवीं संतान को तुम्हें सौंप देंगे । आखिर देवकी तुम्हारी बहन है।
कंस का क्रोध कुछ शांत होने लगा था । वासुदेव के पास और चारा ही क्या था? वरना कौन अपनी संतान को ऐसे देगा? पर उस अवसर पर यह कहना ही उचित था । क्या पता आठवीं संतान हो, ना हो? क्या पता आठवीं संतान होने तक कंस हो, ना हो ? भविष्य पर किसका नियंत्रण है ,पर यह बोलकर देवकी के लिए जीवन दान लेना यह वासुदेव की चतुराई ही थी ।
पर भविष्य में तो श्रीकृष्ण को आना ही था ।
भले ही दृष्टांत बहुत पुराना है पर कदाचित हर इंसान की जिंदगी में ऐसे भयानक मोड़ आ जाते हैं , तब अपने आप को संयमित रखें और बुद्धि से काम लें -यह हम इस दृष्टांत से सीख सकते हैं ।
बहुत सुन्दर
ReplyDeleteसही कहा विजय सर। Anything including truth needs to be seen in totality with preceding and future impacts. इस प्रकार के दृष्टांत ही सत्य को परिभाषित करने में हमारा मार्गदर्शन करते हैं
ReplyDeleteजय श्री कृष्ण