क्रोध पर नियंत्रण
....विजय रुस्तगी
सुरेश और रीमा दोनों बंगलौर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत है। सुरेश तमिलनाडु के एक गांव से आया है, जबकि रीमा कोलकाता से। दोनों एक दूसरे को बहुत पसंद करते हैं और प्रेम विवाह कर लेते हैं।
दोनों परिवारों ने प्रारंभ में तो आपत्ति जताई, पर जब दोनों के विवाह से पुत्र का जन्म हुआ तो दोनों परिवारों ने इस विवाह को स्वीकार कर लिया। पुत्र रवि जिसे प्यार से वो रुनझुन बुलाते थे, लाड़ प्यार से बढ़ने लगा। दोनों कमाने वाले, सम्पन्नता की कोई कमी ना थी। पर सुरेश और रीमा बच्चे को उचित समय नहीं दे पा रहे थे। रुनझुन धीरे धीरे जिद्दी हो गया। बात बात पर गुस्सा करना, अपनी बात मनवाना उसका स्वभाव बन गया। क्रोध में वह किसी को भी, कुछ भी बोल देता।
इस बार सर्दियों में गांव से दादा दादी आये हुये थे। थोड़े ही दिनों में रुनझुन उनसे खूब हिल-मिल गया। दादा दादी को रुनझुन का बात बात में ज़िद और गुस्सा करना रास नहीं आ रहा था।
दादा दादी ने सुरेश और रीमा के साथ मिल कर योजना बनाई। जब रुनझुन अच्छे मूड में था, तब दादाजी ने उसे अपने पास बुलाया । रुनझुन को समझाने की कोशिश की । दादा जी ने बोला कि चलो अब हम एक खेल खेलते हैं । दादा जी ने रुनझुन को एक थैले में कीलें और हथौड़ी ला कर दी । यह नियम बनाया गया कि जब भी गुस्सा आएगा, रुनझुन अपने घर के दाएं हिस्से में पडी लकड़ी के पट्टे पर एक कील ठोकेगा।
एक हफ्ते में ही थैला आधा खाली हो गया । रुनझुन को कुछ कुछ समझ में आने लगा। मन ही मन सुधरने का निर्णय ले चुका था । अगले हफ्ते में सिर्फ 15 ही कीलें गाढ़ी। स्वभाव में सुधार धीरे धीरे ही होता है।
दोनों परिवारों ने प्रारंभ में तो आपत्ति जताई, पर जब दोनों के विवाह से पुत्र का जन्म हुआ तो दोनों परिवारों ने इस विवाह को स्वीकार कर लिया। पुत्र रवि जिसे प्यार से वो रुनझुन बुलाते थे, लाड़ प्यार से बढ़ने लगा। दोनों कमाने वाले, सम्पन्नता की कोई कमी ना थी। पर सुरेश और रीमा बच्चे को उचित समय नहीं दे पा रहे थे। रुनझुन धीरे धीरे जिद्दी हो गया। बात बात पर गुस्सा करना, अपनी बात मनवाना उसका स्वभाव बन गया। क्रोध में वह किसी को भी, कुछ भी बोल देता।
इस बार सर्दियों में गांव से दादा दादी आये हुये थे। थोड़े ही दिनों में रुनझुन उनसे खूब हिल-मिल गया। दादा दादी को रुनझुन का बात बात में ज़िद और गुस्सा करना रास नहीं आ रहा था।
दादा दादी ने सुरेश और रीमा के साथ मिल कर योजना बनाई। जब रुनझुन अच्छे मूड में था, तब दादाजी ने उसे अपने पास बुलाया । रुनझुन को समझाने की कोशिश की । दादा जी ने बोला कि चलो अब हम एक खेल खेलते हैं । दादा जी ने रुनझुन को एक थैले में कीलें और हथौड़ी ला कर दी । यह नियम बनाया गया कि जब भी गुस्सा आएगा, रुनझुन अपने घर के दाएं हिस्से में पडी लकड़ी के पट्टे पर एक कील ठोकेगा।
एक हफ्ते में ही थैला आधा खाली हो गया । रुनझुन को कुछ कुछ समझ में आने लगा। मन ही मन सुधरने का निर्णय ले चुका था । अगले हफ्ते में सिर्फ 15 ही कीलें गाढ़ी। स्वभाव में सुधार धीरे धीरे ही होता है।
दादा दादी रुनझुन के बदलाव को महसूस कर रहे थे। दादाजी ने रुनझुन से कहा कि अब तुम्हें जब भी गुस्सा आएगा और तुम उस को कंट्रोल कर पाओगे तब एक कील उखाड़ लेना। फिर क्या था रुनझुन को इस खेल में मज़ा आने लगा। और धीरे-धीरे 3 हफ्ते में सारी कीलें उखड़ गईं। रुनझुन आज बहुत खुश था। उसने दादा जी को वह पट्टा बडे़ गर्व से दिखाया। दादाजी ने रुनझुन को गोद में ले लिया और बोले - देखो बेटे, कीलें तो सारी उखड़ गयी हैं पर वह लकड़ी का पट्टा पहले जैसा नहीं रहा । उस पर अब बहुत सारे छेद बन गए हैं। रुनझुन को बात समझ आ गई थी ।कान पकड़ कर मुस्कुराते हुए बोला दादाजी मैं अब अनावश्यक गुस्सा नहीं करुंगा।
निष्कर्ष: यदि आप गुस्से से किसी से बात करते हैं तो अपनी बात बाद में संभालने पर भी उसका घाव कहीं न कहीं दूसरे के मन में रह जाता है गुस्से पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।
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