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  महिषासुर का वध
                                                                  _  विजय रुस्तगी


पिछले ब्लाग में अब तक आप पढ़ चुके हैं कि महिषासुर को ब्रह्मा से  वरदान मिला हुआ है कि वह एक नारी के हाथों ही मारा जा सकता है अन्यथा नहीं। उसने सोचा कि वह अमर हो गया है । महिषासुर ने पृथ्वी पर आक्रमण कर दिया और वहां के लोगों को खूब सताया । इसके बाद उसने इंद्र की नगरी अमरावती पर धावा बोल दिया और भयंकर युद्ध के बाद अमरावती पर अपना राज्य स्थापित कर लिया। देवताओं ने मिलकर अपनी शक्ति इकट्ठा की और उस शक्ति से मां दुर्गा की उत्पत्ति हुई।   अब आगे पढ़िए .....

                                    महिषासुर एक शक्तिशाली राक्षस था और अपनी इच्छा से किसी भी जानवर या वस्तु का रूप धारण कर सकता था ।   ऐसा कहा जाता है कि देवी की उत्पत्ति के बाद दुर्गा मां अपने पूरे अस्त्र शस्त्र के साथ, साज श्रृंगार के साथ, शेर पर सवार हो, देवताओं की सेना ले महिषासुर  पर आक्रमण के लिए अमरावती की ओर चल दी। कहते हैं कि सेना का शोर और मां दुर्गा की दहाड़ सुनकर महिषासुर के हृदय की धड़कन एक निमिष के लिए रुक गई। उसने अपने जासूसों को जानकारी प्राप्त करने के लिए भेजा।

                                    जासूसों ने  देवताओं की बड़ी सेना को देखा और उनके बीच  एक बहुत ही सुंदर सी महिला ,जो एक शेर पर सवार है और बहुत सारे आभूषणों से सुशोभित है ,को देखा। यह सारी जानकारी महिषासुर को दी गई। सेना के बीच एक सुन्दर नारी कौतूहल का कारण बनी और इसलिए अधिक चर्चा हुई। महिषासुर इस सुन्दर नारी पर आसक्त हो गया।  

                                  महिषासुर ने अपने प्रधानमंत्री को कहा कि इस महिला को लेके आइए , मैं उसे अपनी रानी बनाना चाहता हूं । प्रधानमंत्री अपने कुछ सैनिकों के साथ विरोधी सेना की ओर चला। महिषासुर की इच्छा  बताई, मां दुर्गा ने कहा मैं तो उसे मारने आई हूं अब युद्ध  मैदान पर ही मिलूंगी। प्रधानमन्त्री ने सब बातें महिषासुर को बताई। यह सुनकर महिषासुर क्रोधित  हो गया।  अपने चुनिंदा सैनिकों को दूत बनाकर दुबारा संदेश भेजा , पर वो भी खाली हाथ लौटकर आए। 

                                      युद्ध का शंख बज चुका था।  महिषासुर की सेना और मां दुर्गा की सेना आमने-सामने  थी। चारों ओर हाहाकार मचा था। तभी दुर्गा मां ने अपनी तलवार से महिषासुर के सेना प्रमुख का गला काट दिया।  महिषासुर की सेना में भगदड़ मच गई। महिषासुर के काफी संख्या में सैनिक मारे गए । अगले दिन महिषासुर अपने बचे हुए सैनिकों को लेकर स्वयं मैदान में पहुंचा।  अपने जहरीले बाणों से देवताओं की सेना को काफी नुकसान पहुंचाया। दुर्गा मां ने अपनी दुश्मन सेना पर सांप जैसे बाणों की वर्षा से प्रतिक्रिया दी।  महिषासुर और उसके सैनिकों के हौंसले पस्त होने लगे।  हार की ओर अग्रसर होता देख, बौखला कर महिषासुर ने पहाड़ का रूप रखा और देवताओं की सेना पर पत्थर बरसाए।  अंततः हाथी और सांप जैसे रूप रखने के बाद भी जब वह नहीं जीत पाया । तब वह शक्ति क्षीण होने पर अपने मूल रूप - भैंस में आ गया ।   तभी मां दुर्गा ने उसकी गर्दन पर सुदर्शन चक्र से वार किया और त्रिशूल उसके शरीर में घुसा दिया। मां की सवारी शेर ने भी आक्रमण कर दिया। इस तरह से महिषासुर का वध हुआ।   मां दुर्गा  और  महिषासुर के साथ 15 दिन तक युद्ध चला। 
           यह समाज में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन को  विजयादशमी भी कहा जाता है। महिषासुर के वध के बाद दुर्गा मां को महिषासुरमर्दिनि भी कहा जाता है।


जय मां दुर्गे नमो-नमो
जय मां दुर्गे नमो-नमो

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